सवा एकड़ तालाब निर्माण पर मिला 60 प्रतिशत अनुदान, वैज्ञानिक तरीके से मत्स्य पालन कर सीधे बाजार में बेचकर अर्जित की डेढ़ लाख रुपये की आय

रायपुर। दृढ़ संकल्प, मेहनत और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर बस्तर जिले के दरभा विकासखंड के ग्राम रामपाल छिंदावाड़ा निवासी कृषक सुदर्शन बघेल ने अपनी आजीविका को नई दिशा दी है। कभी सीमित संसाधनों के बीच पारंपरिक खेती और छोटी डबरी में मछली पालन करने वाले सुदर्शन अब आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक तरीके से मत्स्य पालन कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।
पहले पारंपरिक खेती और छोटी डबरी पर थे निर्भर
सुदर्शन बघेल पहले मुख्य रूप से पारंपरिक खेती-बाड़ी पर निर्भर थे। अतिरिक्त आय के लिए वे एक छोटी धान मिल भी संचालित करते थे। इसके साथ ही छोटी डबरी में पारंपरिक तरीके से मछली पालन करते थे।
सीमित संसाधनों और पारंपरिक कार्यप्रणाली के कारण मछली पालन से होने वाली आय भी सीमित थी। ऐसे में व्यवसाय का विस्तार करना उनके लिए चुनौती बना हुआ था।
सरकारी योजना ने दिया आगे बढ़ने का अवसर
आय बढ़ाने के प्रयासों के दौरान सुदर्शन को मत्स्य विभाग की योजनाओं की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) का लाभ लेने का निर्णय लिया।
योजना के तहत उन्होंने सवा एकड़ क्षेत्र में तालाब निर्माण एवं इनपुट सहायता घटक का लाभ लिया। अनुसूचित जनजाति वर्ग के अंतर्गत उन्हें करीब 5.5 लाख रुपये की स्वीकृत लागत पर 60 प्रतिशत अनुदान प्राप्त हुआ।
आर्थिक सहायता के साथ मत्स्य विभाग से मिले तकनीकी मार्गदर्शन ने उन्हें आधुनिक और व्यवस्थित तरीके से मछली पालन करने में मदद की।
वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन से बढ़ा उत्पादन
योजना का लाभ मिलने के बाद सुदर्शन ने अपने तालाब में वैज्ञानिक तरीके से मिश्रित प्रजातियों की मछलियों का पालन शुरू किया। बेहतर प्रबंधन, नियमित देखरेख और मेहनत के परिणामस्वरूप उन्हें अच्छी गुणवत्ता और बेहतर वजन वाली मछलियों का उत्पादन प्राप्त हुआ।
आधुनिक प्रबंधन अपनाने से मछली पालन पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित हुआ और इससे उनकी आय बढ़ाने का रास्ता भी तैयार हुआ।
बिचौलियों को छोड़ सीधे बाजार में बेची मछली
सुदर्शन ने केवल उत्पादन बढ़ाने पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि मछलियों के विपणन के तरीके में भी बदलाव किया। उन्होंने बिचौलियों के माध्यम से मछली बेचने के बजाय अपने गांव और आसपास के बाजारों में सीधे उपभोक्ताओं तक अपनी उपज पहुंचाई।
प्रत्यक्ष बिक्री से उन्हें अपनी मछलियों का बेहतर मूल्य मिला। इससे उन्होंने करीब डेढ़ लाख रुपये की प्रत्यक्ष विक्रय आय अर्जित की।
मत्स्य पालन बना आत्मनिर्भर आजीविका का आधार
आज सुदर्शन बघेल के लिए मछली पालन केवल अतिरिक्त आय का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह उनकी आत्मनिर्भर आजीविका का मजबूत आधार बन चुका है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मिली आर्थिक सहायता, मत्स्य विभाग का तकनीकी मार्गदर्शन, वैज्ञानिक प्रबंधन और उनकी मेहनत ने उन्हें सीमित संसाधनों से आगे बढ़कर आधुनिक मत्स्य उद्यम की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर दिया है।
सुदर्शन की कहानी यह बताती है कि योजनाओं की जानकारी लेकर उनका सही तरीके से उपयोग किया जाए तो पारंपरिक आजीविका को भी आधुनिक और बेहतर आय के साधन में बदला जा सकता है।
