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🔴 अमानक पैरासिटामोल के चार बैचों पर उठे गंभीर सवाल
🔴 कंपनी ने दवा को मानक बताया, फिर बैच बदलने की बात भी मानी
🔴 ब्लैकलिस्ट और पेनाल्टी की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ने पर विवाद
🔴 CGMSC के फैसले और अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल
रायपुर। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कार्पोरेशन (CGMSC) की करीब 190 करोड़ रुपये की दवा खरीद एक बार फिर विवादों में है। अमानक घोषित पैरासिटामोल के चार बैचों को लेकर शुरू हुई कार्रवाई अब सवालों के घेरे में आ गई है। आपूर्तिकर्ता 9एम इंडिया को ब्लैकलिस्ट करने और उसकी सुरक्षा निधि (एफडीआर) जब्त करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, लेकिन बाद में प्रस्तावित कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई गई।

कंपनी के जवाब में दिखा विरोधाभास
कंपनी ने अपने जवाब में एक ओर दावा किया कि संबंधित दवा पूरी तरह गुणवत्ता मानकों के अनुरूप थी। वहीं दूसरी ओर उन्हीं विवादित बैचों को बदलकर दोबारा आपूर्ति किए जाने की बात भी स्वीकार कर ली। इसके अलावा मल्टी विटामिन कैप्सूल, डाइसाइक्लोमाइन टैबलेट और एंटीबायोटिक इंजेक्शन के कुछ संदिग्ध बैचों का वितरण भी रोकना पड़ा।
कार्रवाई नहीं बढ़ने पर उठे सवाल
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार कंपनी का जवाब स्वीकार कर सीजीएमएससी ने प्रस्तावित दंडात्मक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई। आरोप है कि इस फैसले से कंपनी ब्लैकलिस्टिंग, अनुबंध के तहत लगने वाली आर्थिक पेनाल्टी और पूरी खेप बदलने की जिम्मेदारी से बच गई।
अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
जिस समय यह निर्णय लिया गया, उस दौरान सीजीएमएससी के प्रबंध संचालक रीतेश अग्रवाल, जीएम (टेक्निकल) पंकज उपाध्याय और एफएसओ प्रेमेश्वर देवांगन संबंधित प्रक्रिया से जुड़े हुए थे। ऐसे में निर्णय प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
यदि दवा सही थी तो बैच क्यों बदले?
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कंपनी का दावा सही था और दवा पूरी तरह मानक के अनुरूप थी, तो फिर उन्हीं बैचों को वापस लेकर नई खेप भेजने की जरूरत क्यों पड़ी। यही मामला पूरे विवाद का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।
नियम क्या कहते हैं?
सीजीएमएससी की निविदा शर्तों के अनुसार यदि किसी दवा का बैच लैब जांच में “नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी (NSQ)” पाया जाता है, तो 60 दिनों के भीतर पूरी खेप बदलना अनिवार्य होता है। साथ ही संबंधित बैच पर 20 प्रतिशत तक आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। यदि किसी दवा के तीन बैच अमानक पाए जाते हैं, तो संबंधित दवा को तीन वर्ष के लिए ब्लैकलिस्ट करने और कंपनी की एफडीआर जब्त करने का भी प्रावधान है।
