कोयलीबेड़ा के बारकोट प्राथमिक शाला तक पहुंचने के लिए शिक्षक बरसात में नाव से पार करते हैं कोटरी नदी; कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं शिक्षक

कांकेर। शिक्षक दिवस पर कांकेर के कोयलीबेड़ा विकासखंड के दुर्गम इलाकों से शिक्षकों के समर्पण की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो किसी मिसाल से कम नहीं है। बारकोट प्राथमिक शाला में पदस्थ शिक्षक वर्षों से कठिन परिस्थितियों के बीच बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल पहुंच रहे हैं। बरसात के दिनों में कोटरी नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद इन शिक्षकों का सफर और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
शहर और मुख्य मार्गों से दूर स्थित इस क्षेत्र में स्कूल पहुंचने के लिए कई बार शिक्षकों को नाव के सहारे नदी पार करनी पड़ती है। इसके बाद भी उनका सफर खत्म नहीं होता, बल्कि नदी पार करने के बाद कई किलोमीटर पैदल चलकर उन्हें स्कूल तक पहुंचना पड़ता है।
1998 से नाव के सहारे स्कूल पहुंच रहे हरिश्चंद्र वैद्य
बारकोट प्राथमिक शाला के शिक्षक हरिश्चंद्र वैद्य वर्ष 1998 से लगातार नाव के सहारे नदी पार कर स्कूल पहुंच रहे हैं। उनका कहना है कि नदी पार करते समय डर जरूर लगता है, लेकिन बच्चों का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी उन्हें हर चुनौती का सामना करने का हौसला देती है।
हरिश्चंद्र के मुताबिक एक बार नाव पलटने की घटना भी हो चुकी है। उस समय कमर में दर्द होने के कारण उन्होंने पहले ही नदी पार कर ली थी। कई बार नदी में तेज बहाव के कारण नाव चलाना बेहद मुश्किल हो जाता है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने स्कूल जाना नहीं छोड़ा।
2006 से इसी रास्ते पर शिक्षक लोकनाथ कुंभकार
शिक्षक लोकनाथ कुंभकार भी वर्ष 2006 से इसी कठिन रास्ते से स्कूल आ-जा रहे हैं। उनके मुताबिक कई बार नदी पार करते समय नाव डूबने जैसी स्थिति बन चुकी है। ऐसी परिस्थितियों में उन्हें तैरकर अपनी जान बचानी पड़ी है।
नदी पार करने के बाद भी कई किलोमीटर का पैदल सफर करना पड़ता है। जरूरत पड़ने पर किसी दूसरे पर निर्भर न रहना पड़े, इसके लिए उन्होंने खुद नाव चलाना भी सीख लिया है।
बरसात में बढ़ जाती है चुनौती
बारकोट संगम घाट और कोटरी नदी का इलाका बारिश के मौसम में शिक्षकों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। नदी का जलस्तर बढ़ने और बहाव तेज होने पर नाव से नदी पार करना जोखिम भरा हो जाता है।
इसके बावजूद शिक्षक नियमित रूप से बच्चों तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। दुर्गम क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था को बनाए रखने में इन शिक्षकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
करीब 30 शिक्षक वर्षों से कर रहे संघर्ष
जिला प्रशासन के अनुसार कोयलीबेड़ा क्षेत्र में करीब 30 शिक्षक पिछले 20 से 25 वर्षों से नदी और नाले पार कर स्कूल पहुंच रहे हैं। प्रशासन ने शिक्षकों के इस समर्पण को सराहनीय बताया है, लेकिन साथ ही उनकी सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई है।
नाव और लाइफ जैकेट की व्यवस्था पर प्रशासन का जोर
कलेक्टर कुंदन कुमार ने कहा कि शिक्षकों का इतने वर्षों से कठिन परिस्थितियों में स्कूल पहुंचना गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। जिला प्रशासन की ओर से नाव और लाइफ जैकेट जैसी सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जाएगा।
शिक्षक दिवस पर सामने आई समर्पण की अनोखी तस्वीर
शिक्षक दिवस पर जब देशभर में शिक्षकों के योगदान को याद किया जा रहा है, ऐसे समय में कांकेर के दुर्गम इलाकों के ये शिक्षक शिक्षा के प्रति अपने समर्पण की अलग ही कहानी लिख रहे हैं। तेज बहाव वाली नदी, लंबा पैदल सफर और जोखिम के बावजूद बच्चों को पढ़ाने का उनका संकल्प बताता है कि दूर-दराज के इलाकों में शिक्षा की लौ जलाए रखने के लिए शिक्षक कितनी कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।




