कोरबा जनदर्शन में दिव्यांगजनों को तत्काल मिली मदद, 6 हितग्राहियों को दिए गए सहायक उपकरण
कलेक्टर कुणाल दुदावत के निर्देश पर प्रशासन ने दिखाई संवेदनशीलता, मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल, व्हीलचेयर और सीपी चेयर सहित जरूरत के अनुसार उपकरण किए वितरित

कोरबा, 7 सितंबर 2026। कलेक्टर जनदर्शन में अपनी समस्याओं और जरूरतों को लेकर पहुंचे दिव्यांगजनों के आवेदनों पर जिला प्रशासन ने संवेदनशीलता दिखाते हुए त्वरित कार्रवाई की। जनदर्शन में प्राप्त आवेदनों के आधार पर 6 दिव्यांग हितग्राहियों को उनकी आवश्यकता के अनुसार तत्काल सहायक उपकरण उपलब्ध कराए गए।
कलेक्टर कुणाल दुदावत ने जनदर्शन में दिव्यांगजनों की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए। कलेक्टर के निर्देशन में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रतीक जैन द्वारा हितग्राहियों को उनकी जरूरत के अनुरूप सहायक उपकरण प्रदान किए गए।
6 हितग्राहियों को मिले सहायक उपकरण
जनदर्शन में पहुंचे परदेशी दास, निवासी धवईपुर, कटघोरा को मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल प्रदान की गई। वहीं गुड्डी सागर, निवासी मोतीसागर पारा, कोरबा को मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल और वॉकर दिया गया।
इसी तरह रामजी साव, निवासी दर्री, कोरबा को मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल, ललित जांगड़े, निवासी कुसमुंडा, को व्हीलचेयर प्रदान की गई।
वहीं दृष्टि महंत, निवासी दुरपा रोड, कोरबा और निरवर, निवासी जिला कोरबा को सी.पी. चेयर उपलब्ध कराई गई।
सहायक उपकरण से आसान होगा दैनिक जीवन
सहायक उपकरण मिलने से दिव्यांग हितग्राहियों के लिए दैनिक जीवन की जरूरी गतिविधियां अधिक सहज होंगी। मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल, व्हीलचेयर, वॉकर और सीपी चेयर जैसे उपकरण उन्हें आवागमन तथा सामान्य गतिविधियों में अधिक आत्मनिर्भर बनने में मदद करेंगे।
सहायक उपकरण मिलने पर हितग्राहियों ने खुशी जताई और जिला प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त किया। प्रशासन की इस त्वरित पहल से यह भी स्पष्ट हुआ कि जनदर्शन के माध्यम से प्राप्त जरूरतमंद नागरिकों के आवेदनों पर प्राथमिकता से कार्रवाई की जा रही है।
दिव्यांगजनों की जरूरतों को प्राथमिकता
कलेक्टर कुणाल दुदावत ने कहा कि दिव्यांगजनों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता के साथ पूरा करना जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है। जनदर्शन में प्राप्त आवेदनों पर यथासंभव त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है, ताकि जरूरतमंद नागरिकों को शासकीय योजनाओं और सहायता का लाभ समय पर मिल सके।
उन्होंने कहा कि सहायक उपकरण दिव्यांगजनों के लिए केवल सुविधा का साधन नहीं हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सम्मान और बेहतर जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण सहयोग हैं। जिला प्रशासन का प्रयास है कि पात्र दिव्यांगजनों को उनकी आवश्यकता के अनुरूप योजनाओं और सुविधाओं का लाभ सुगमता एवं समयबद्ध तरीके से उपलब्ध कराया जाए।
अधिकारी रहे मौजूद
इस अवसर पर अपर कलेक्टर ओंकार यादव, अपर कलेक्टर माधुरी सोम, उप संचालक समाज कल्याण विभाग, कोरबा सहित संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे।
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सामूहिक खेती से बदली 35 महिलाओं की जिंदगी, उजाला उत्पादक समूह ने 600 क्विंटल सब्जियां बेचकर कमाए 6 लाख रुपये
सारंगढ़-बिलाईगढ़ के रिसोरा में बिहान से जुड़ी महिलाओं की पहल, लौकी-करेला और खीरा की खेती से बढ़ी आमदनी; बिचौलियों को छोड़ सीधे थोक बाजार में बेच रही उपज

रायपुर, 7 सितंबर 2026। पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से सब्जी उत्पादन करने वाली ग्रामीण महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है। सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला विकासखंड के ग्राम पंचायत रिसोरा में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़ी महिलाओं ने सामूहिक खेती के जरिए अपनी आय बढ़ाने में सफलता हासिल की है।
उजाला उत्पादक समूह से जुड़ी 35 महिला किसानों ने एकजुट होकर लौकी, करेला और खीरा की खेती की। समूह ने कुल 600 क्विंटल सब्जियों का उत्पादन किया और अपनी उपज को सीधे थोक बाजार में बेचकर करीब 6 लाख रुपये की आय अर्जित की।
2 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी से शुरू हुआ सफर
उजाला उत्पादक समूह का गठन वर्ष 2025 में किया गया था। समूह का उद्देश्य महिलाओं को एकजुट कर सामूहिक प्रयास से कृषि उत्पादन बढ़ाना, लागत कम करना और उपज के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराना था।
आजीविका गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए समूह को क्लस्टर से 50 हजार रुपये की स्टार्टअप राशि मिली। इसके अलावा सखी क्लस्टर संगठन, बुदेली से 1 लाख 50 हजार रुपये का ऋण प्राप्त हुआ। इस तरह महिलाओं के पास कुल 2 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी उपलब्ध हुई।
इसी पूंजी और मार्गदर्शन के सहारे महिलाओं ने वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाते हुए अपने खेतों में लौकी, करेला और खीरा की खेती शुरू की।
600 क्विंटल सब्जियों का हुआ उत्पादन
महिलाओं की मेहनत और आधुनिक कृषि तकनीकों के इस्तेमाल से सब्जियों के उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी हुई। शुरुआत में फसल से होने वाली बचत ने महिलाओं का उत्साह बढ़ाया और इसके बाद उन्होंने खेती का दायरा भी बढ़ाया।
सामूहिक खेती के जरिए समूह की महिलाओं ने 250 क्विंटल लौकी, 250 क्विंटल करेला और 100 क्विंटल खीरा का उत्पादन किया। इस तरह कुल सब्जी उत्पादन 600 क्विंटल तक पहुंच गया।
बिचौलियों से दूरी, सीधे थोक बाजार में बिक्री
उजाला उत्पादक समूह की सफलता में बेहतर मार्केटिंग रणनीति की भी अहम भूमिका रही। महिलाओं ने अपनी उपज बेचने के लिए बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय सीधे थोक बाजार का रुख किया।
सीधे बाजार से जुड़ने के कारण उन्हें अपनी फसल का बेहतर दाम मिला। इससे समूह की कुल आय करीब 6 लाख रुपये तक पहुंची। सामूहिक खेती और सीधे बाजार से जुड़ाव ने महिलाओं को खेती को अधिक लाभकारी बनाने का रास्ता दिखाया।
बिहान से महिलाओं को मिल रहा आर्थिक संबल
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए बिहान जैसी योजनाओं के माध्यम से आजीविका गतिविधियों को बढ़ावा दे रही है।
जिला प्रशासन और मैदानी स्तर पर जुड़े अमले द्वारा मार्गदर्शन तथा सतत मॉनिटरिंग से महिलाओं को योजनाओं का लाभ लेने और अपनी आजीविका गतिविधियों को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है।
उजाला उत्पादक समूह की महिलाओं की यह पहल बताती है कि सामूहिक प्रयास, आधुनिक खेती और बेहतर बाजार से जुड़ाव ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का मजबूत साधन बन सकता है। 35 महिलाओं की यह सफलता अन्य ग्रामीण महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन रही है।
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रायपुर में लोकरंग पर्व के दूसरे दिन गूंजे लोकसुर, लोरिक चंदा से ददरिया-चंदैनी तक दिखी छत्तीसगढ़ की संस्कृति
मुक्ताकाशी मंच पर जीवंत हुईं लोकगाथाएं और लोकपरंपराएं, कलाकारों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ा

रायपुर, 7 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू, लोकजीवन की सहज संवेदनाएं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की रंगत लोकरंग पर्व के दूसरे दिन देखने को मिली। मुक्ताकाशी मंच पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में लोरिक चंदा, ददरिया और चंदैनी जैसी पारंपरिक लोकविधाओं की शानदार प्रस्तुतियों ने दर्शकों को प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराया।
लोककलाकारों की सजीव प्रस्तुतियों के दौरान पूरा वातावरण छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत और लोकपरंपराओं के रंग में रंग गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद रहे और उन्होंने पारंपरिक लोकविधाओं का आनंद लिया।
लोरिक चंदा की प्रस्तुति से हुई कार्यक्रम की शुरुआत
कार्यक्रम की शुरुआत छत्तीसगढ़ की लोकप्रिय लोकगाथा ‘लोरिक चंदा’ के भावपूर्ण प्रसंग से हुई। श्री व्यासनाथ योगी एवं उनके साथियों ने अपनी प्रस्तुति के जरिए लोकगाथा की कथात्मकता, भाव और पारंपरिक गायन शैली को मंच पर जीवंत किया।
लोकसंगीत और पारंपरिक गायन की प्रस्तुति ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ के लोकजीवन से जोड़ दिया। प्रस्तुति में लोकगाथा के भाव और कथानक को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।
ददरिया और चंदैनी ने बांधा समां
इसके बाद श्री विजय साहू एवं साथियों ने ददरिया की प्रस्तुति दी। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और लोकजीवन से गहराई से जुड़ी ददरिया की मधुर धुनों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
वहीं श्री बरसन देशलहरे ने चंदैनी के माध्यम से प्रेम, लोकजीवन और मानवीय संवेदनाओं को सुरों में पिरोया। प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ की ग्रामीण जीवनशैली, लोकभावनाओं और सामाजिक सरोकारों की सहज झलक दिखाई दी।
लोककलाओं के संरक्षण और कलाकारों को प्रोत्साहन पर जोर
कार्यक्रम में संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि स्थानीय मंच छत्तीसगढ़ की लोकविधाओं से जुड़े कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने और प्रोत्साहन पाने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी हैं।
डॉ. कन्नौजे ने कहा कि लोरिक चंदा, चंदैनी गीत और ददरिया जैसी लोकविधाएं छत्तीसगढ़ के लोकजीवन की पहचान हैं। इनका संरक्षण और मंचन युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सांस्कृतिक जगत की प्रमुख हस्तियां रहीं मौजूद
कार्यक्रम में संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, पूर्व संचालक श्री अनिल कुमार साहू, उपसंचालक श्री उमेश मिश्रा, छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कवि मीर अली मीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार श्री दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार श्री विजय मिश्रा तथा समाजसेवी श्री उदयभान चौहान विशेष रूप से उपस्थित रहे।
लोकविधाओं को एक मंच पर ला रहा लोकरंग पर्व
लोकरंग पर्व के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकगाथाओं, लोकगीतों, लोकसंगीत और पारंपरिक लोकनृत्यों को एक साझा मंच प्रदान किया जा रहा है। पर्व के दूसरे दिन की प्रस्तुतियों ने यह संदेश दिया कि आधुनिकता के दौर में अपनी लोकपरंपराओं को सहेजना और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।
मुक्ताकाशी मंच पर गूंजे लोकसुरों और कलाकारों की सजीव प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति के रंग में रंग दिया। लोरिक चंदा की कथा, ददरिया की मिठास और चंदैनी के भावपूर्ण सुरों ने लोकरंग पर्व के दूसरे दिन को यादगार बना दिया।
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मछली पालन के सपने को मिला सरकारी अनुदान का सहारा, दुर्गावती ने बायोफ्लॉक तालाब से शुरू की आत्मनिर्भरता की राह
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मिला 60 प्रतिशत अनुदान, 5 से 6 क्विंटल मछली उत्पादन से करीब एक लाख रुपये आय की उम्मीद

बलरामपुर। कभी पूंजी के अभाव में अधूरा रह गया मछली पालन का सपना अब बलरामपुर जिले के ग्राम करीचलगली की दुर्गावती सिरोटिया के लिए आत्मनिर्भरता का जरिया बन गया है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मिले शासकीय अनुदान और विभागीय तकनीकी मार्गदर्शन की मदद से उन्होंने बायोफ्लॉक तालाब तैयार कराया है।
दुर्गावती की लंबे समय से मछली पालन का व्यवसाय शुरू करने की इच्छा थी। उनका उद्देश्य परिवार की आय बढ़ाने के साथ स्वयं का रोजगार खड़ा करना था, लेकिन पर्याप्त पूंजी नहीं होने के कारण वे अपना सपना पूरा नहीं कर पा रही थीं। इसी दौरान उन्हें प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना की जानकारी मिली और उन्होंने योजना का लाभ लेकर मछली पालन शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
60 प्रतिशत सरकारी अनुदान से तैयार हुआ बायोफ्लॉक तालाब
वर्ष 2025-26 में दुर्गावती ने योजना के तहत बायोफ्लॉक तालाब का निर्माण कराया। इसके लिए मत्स्य विभाग की ओर से परियोजना लागत का 60 प्रतिशत शासकीय अनुदान दिया गया, जबकि शेष 40 प्रतिशत राशि उन्होंने स्वयं वहन की।
विभाग की ओर से उन्हें मछली पालन से संबंधित तकनीकी जानकारी, मार्गदर्शन और आवश्यक सहयोग भी दिया गया। आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण मिलने से उनके लिए व्यवसाय शुरू करना आसान हुआ।
5 से 6 क्विंटल मछली उत्पादन की उम्मीद
बायोफ्लॉक तालाब तैयार होने के बाद दुर्गावती अब मछली पालन को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। उन्हें इस तालाब से लगभग 5 से 6 क्विंटल मछली उत्पादन की उम्मीद है।
उत्पादन के आधार पर करीब एक लाख रुपये तक की आय होने की संभावना है। अनुभव बढ़ने के साथ दुर्गावती भविष्य में मछली पालन के कारोबार को और विस्तार देने की योजना भी बना रही हैं।
अनुदान बना आत्मनिर्भरता का आधार
दुर्गावती बताती हैं कि आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण जिस काम को शुरू करने का सपना वर्षों से था, उसे शासकीय योजना ने पूरा करने का अवसर दिया। उनके लिए यह सहायता केवल अनुदान नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का माध्यम बनी है।
उनका कहना है कि यदि ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं को आर्थिक सहयोग के साथ प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन मिले तो वे सीमित संसाधनों में भी अपना व्यवसाय शुरू कर सकती हैं।
ग्रामीण महिलाओं के लिए बनी प्रेरणा
करीचलगली में तैयार बायोफ्लॉक तालाब अब दुर्गावती के लिए सिर्फ मछली उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि स्वरोजगार और आत्मनिर्भर भविष्य की शुरुआत बन चुका है।
उनकी पहल यह संदेश देती है कि सरकारी योजनाओं का सही तरीके से लाभ उठाकर ग्रामीण महिलाएं अपनी रुचि और हुनर को व्यवसाय में बदल सकती हैं। इससे न केवल परिवार की आमदनी बढ़ती है, बल्कि गांवों में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलती है।
