माओवादी गढ़ों में गूंजेगा तिरंगे का संदेश
🔴 12 से 14 अगस्त तक नारायणपुर से कर्रेगुट्टा तक निकलेगी बस्तर तिरंगा यात्रा-2026
🔴 उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा करेंगे यात्रा का नेतृत्व
🔴 दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर के पुराने माओवादी प्रभाव वाले इलाकों से गुजरेगी यात्रा
🔴 मिनपा-ताड़मेटला, चिंतागुफा, जगरगुंडा और टेकलगुड़ेम होंगे यात्रा के प्रमुख पड़ाव
🔴 कभी हिंसा और बंद के फरमान के लिए चर्चित इलाकों में अब तिरंगे के साथ चलेंगे युवा
बस्तर। जिस बस्तर में कभी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराना भी चुनौती माना जाता था, अब उसी क्षेत्र के पुराने माओवादी गढ़ों से तिरंगा यात्रा निकलेगी। बस्तर तिरंगा यात्रा-2026 12 से 14 अगस्त तक नारायणपुर से शुरू होकर दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर होते हुए कर्रेगुट्टा पहुंचेगी। यात्रा का नेतृत्व उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा करेंगे।

माओवादी संगठन लंबे समय तक राष्ट्रीय पर्वों के दौरान काले झंडे और बंद के फरमान के जरिए राष्ट्रध्वज का विरोध करते रहे हैं। ऐसे इलाकों में अब युवाओं का तिरंगा लेकर निकलना बस्तर में बदलते माहौल और राष्ट्रध्वज के प्रति बढ़ते विश्वास का संदेश माना जा रहा है।
यात्रा के मार्ग का भूगोल रहा है हिंसा का गवाह
इस यात्रा की खासियत इसका मार्ग है। यात्रा बस्तर के उन इलाकों से होकर गुजरेगी, जहां कभी माओवादी हिंसा ने गांवों की पहचान तक बदल दी थी। मिनपा-ताड़मेटला, चिंतागुफा, जगरगुंडा, सिलगेर और टेकलगुड़ेम जैसे इलाके बड़े माओवादी हमलों और सुरक्षा अभियानों के कारण देशभर में चर्चा में रहे हैं।
नारायणपुर से शुरू होकर कर्रेगुट्टा में होगा समापन
यात्रा के पहले दिन नारायणपुर से धौड़ाई, कन्हारगांव, कोड़ेनार, बोदली, सातधार, बारसूर और गीदम होते हुए दंतेवाड़ा पहुंचने का कार्यक्रम है।
दूसरे दिन यात्रा कुआकोंडा, भूसारास घाटी, चिंतागुफा, सुकमा, एर्राबोर, मनीकोटा, दोरनापाल, पोलमपल्ली, कुकानार, मिनपा-ताड़मेटला, चिंतलनार, जगरगुंडा, सिलगेर, टेकलगुड़ेम और आवापल्ली होते हुए बीजापुर पहुंचेगी।
तीसरे दिन आवापल्ली, उसूर, गलगम और नंबी होते हुए यात्रा करे्रेगुट्टा पहुंचेगी, जहां इसका समापन होगा।
तिरंगा यात्रा के रास्ते में हिंसा के पुराने घाव
ताड़मेटला-2010: 6 अप्रैल 2010 को ताड़मेटला क्षेत्र में माओवादियों के हमले में 76 सुरक्षाकर्मी बलिदान हुए थे। यह देश के सबसे घातक माओवादी हमलों में शामिल रहा।
चिंतागुफा: ताड़मेटला हमले का क्षेत्र इसी थाना क्षेत्र से जुड़ा था। दक्षिण बस्तर में लंबे समय तक यह माओवादी प्रभाव और सुरक्षा अभियानों का प्रमुख इलाका रहा।
बुर्कापाल: वर्ष 2017 में बुर्कापाल में हुए माओवादी हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान बलिदान हुए थे।
जगरगुंडा: लंबे समय तक माओवादी प्रभाव वाला दुर्गम क्षेत्र रहा। सड़क और सरकारी पहुंच बढ़ने के साथ यह इलाका सुरक्षा और विकास दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण बन गया है।
टेकलगुड़ेम: वर्ष 2021 में यहां सुरक्षा बलों पर बड़ा माओवादी हमला हुआ था। इसके बाद यह क्षेत्र देशभर में चर्चा में आया।
करे्रेगुट्टा: बीजापुर का यह पहाड़ी इलाका लंबे समय तक माओवादी प्रभाव वाले दुर्गम भूभाग के रूप में जाना जाता रहा। अब यही तिरंगा यात्रा का अंतिम पड़ाव होगा।
बस्तर में तिरंगा बना बदलाव का प्रतीक
अगस्त 2025 में कांकेर जिले के बिनागुंडा गांव में तिरंगा फहराने की घटना के बाद माओवादी हिंसा का मामला सामने आया था। 15 अगस्त को मनीष नुरेटी ने ग्रामीणों और बच्चों के साथ तिरंगा फहराया था। सामने आए वीडियो में बच्चे राष्ट्रगान गाते और ग्रामीण भारत माता की जय के नारे लगाते दिखाई दिए थे।
इसके बाद माओवादियों ने उन्हें पकड़कर जन अदालत में हत्या कर दी थी। पुलिस के अनुसार, माओवादियों ने उन पर पुलिस मुखबिर होने का आरोप लगाया था। यह घटना बताती है कि माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में तिरंगा लंबे समय तक समानांतर सत्ता को चुनौती देने का प्रतीक भी रहा।
अब उसी भूगोल में तिरंगा यात्रा का निकलना बस्तर में आए बदलाव का बड़ा सार्वजनिक संदेश माना जा रहा है।
