2023 में सभी 14 सीटें हारने के बाद कांग्रेस का बूथ स्तर पर फोकस, सिंहदेव की सक्रियता के बीच भगत का साथ बना चर्चा का विषय

अंबिकापुर। सरगुजा संभाग की राजनीति में कांग्रेस के भीतर नई तस्वीर बनती दिखाई दे रही है। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में सरगुजा संभाग की सभी 14 सीटों पर हार के बाद कांग्रेस अब संगठन को नए सिरे से मजबूत करने में जुटी है। बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने की इस कवायद में पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव की सक्रियता लगातार बढ़ रही है।
सिंहदेव इन दिनों पूरे छत्तीसगढ़ के दौरे के साथ-साथ सरगुजा संभाग पर विशेष फोकस कर रहे हैं। वे अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में पहुंचकर कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद कर रहे हैं। कई मौकों पर सिंहदेव यह कह चुके हैं कि अब उन्हें किसी पद की लालसा नहीं है। वे चुनाव लड़ें या न लड़ें, उनकी प्राथमिकता छत्तीसगढ़ में दोबारा कांग्रेस की सरकार देखना है।
टीएस सिंहदेव और अमरजीत भगत की नजदीकी बनी चर्चा का विषय
सिंहदेव की बढ़ती सक्रियता के बीच पूर्व मंत्री अमरजीत भगत का उनके साथ खड़ा होना कांग्रेस की राजनीति में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। दोनों नेता अब संगठनात्मक कार्यक्रमों और विधानसभा क्षेत्रों के दौरों में साथ नजर आ रहे हैं।
उत्तर छत्तीसगढ़ में सरगुजा पैलेस लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति का एक प्रमुख आधार रहा है। वहीं अमरजीत भगत ने शुरुआत से ही कांग्रेस के भीतर अलग राजनीतिक धड़े के साथ अपनी पहचान बनाई।
अजीत जोगी के करीबी रहे अमरजीत भगत
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद जब अजीत जोगी मुख्यमंत्री बने, उस दौरान अमरजीत भगत उनके करीबी और प्रमुख समर्थकों में शामिल रहे। वर्ष 2003 में पहली बार सीतापुर विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर वे विधायक बने।
इसके बाद भगत लगातार चार बार सीतापुर से विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सरगुजा संभाग की सभी सीटों पर जीत हासिल की थी। उस समय टीएस सिंहदेव के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं और उनके नेतृत्व में तैयार किए गए कांग्रेस के घोषणा पत्र को भी जीत के प्रमुख कारणों में गिना गया था।
भूपेश बघेल सरकार में बढ़ी भगत की सक्रियता
2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने। इस दौर में अमरजीत भगत का झुकाव बघेल की ओर बढ़ा और उत्तर छत्तीसगढ़ की राजनीति में उन्हें मुख्यमंत्री के करीबी नेताओं में गिना जाने लगा।
इसी दौरान सिंहदेव और भगत के बीच राजनीतिक दूरी भी सार्वजनिक तौर पर नजर आई। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी होती रही कि कांग्रेस उत्तर छत्तीसगढ़ में अमरजीत भगत के रूप में एक अलग राजनीतिक चेहरा मजबूत करना चाहती है।
सत्ता जाने के बाद बदली सियासी तस्वीर
2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता जाने के बाद सरगुजा की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिला। अमरजीत भगत भी अब टीएस सिंहदेव के साथ नजदीकी बनाए हुए नजर आ रहे हैं।
अंबिकापुर में धरना-प्रदर्शन हो या संगठनात्मक कार्यक्रम, दोनों नेता कई मौकों पर एक साथ दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में सीतापुर विधानसभा क्षेत्र में सिंहदेव के दौरे के दौरान अमरजीत भगत भी उनके साथ नजर आए।
दोनों नेताओं ने कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और संगठन की बैठकों में हिस्सा लिया। सीतापुर और मैनपाट में हुई संगठन सृजन बैठकों में सिंहदेव और भगत की एक साथ मौजूदगी से दोनों खेमों के कार्यकर्ताओं में भी उत्साह देखने को मिला।
दो बड़े गुटों के साथ आने से कांग्रेस को क्या फायदा?
कांग्रेस शासन के दौरान मंत्री रहते हुए अमरजीत भगत ने उत्तर छत्तीसगढ़ में अपने समर्थकों का मजबूत नेटवर्क तैयार किया था। अब अगर भगत और सिंहदेव के समर्थक एक साथ संगठन के लिए सक्रिय होते हैं, तो कांग्रेस को आगामी चुनावों की तैयारी में इसका फायदा मिल सकता है।
राजनीतिक तौर पर इसे उत्तर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के दो प्रभावशाली धड़ों के करीब आने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। इससे लंबे समय से अलग-अलग खेमों में बंटे कार्यकर्ताओं के बीच भी एकजुटता बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
जिनसे थी दूरी, उन्हीं के साथ लग रहे ‘टीएस बाबा जिंदाबाद’ के नारे
सीतापुर विधानसभा क्षेत्र में वर्ष 2023 में पहली बार अमरजीत भगत को चुनावी हार का सामना करना पड़ा। अब जब सिंहदेव सीतापुर पहुंचे तो दोनों नेताओं की नजदीकी ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया।
सिंहदेव ने अपने संबोधन के जरिए एकजुट होकर कांग्रेस को मजबूत करने का संदेश दिया। वहीं अमरजीत भगत ने अपने संबोधन की शुरुआत में छत्तीसगढ़ महतारी और कांग्रेस पार्टी के साथ ‘टीएस बाबा जिंदाबाद’ के नारे भी लगवाए।
सिंहदेव ने भगत समर्थकों के घर जाकर कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और एकजुटता का संदेश दिया। बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच अब सवाल यही है कि क्या सिंहदेव और भगत की यह नजदीकी सरगुजा में कांग्रेस संगठन को दोबारा मजबूत करने में कामयाब होगी?
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