2019 से पोस्टमार्टम सेंटर में दे रहीं सेवाएं, एक दिन में 10 शवों का पोस्टमार्टम करने का भी अनुभव; बच्चों और गर्भवती महिलाओं के मामले सबसे चुनौतीपूर्ण

भिलाई। “मुर्दों से नहीं, जिंदा इंसानों से डर लगता है।” दुर्ग जिले की 31 वर्षीय डॉ. अंकिता खंडेलवाल की यह बात उनके पेशे के प्रति बदले नजरिए को बयां करती है। करीब एक हजार पोस्टमार्टम कर चुकीं डॉ. अंकिता के लिए आज यह काम डर या भय का विषय नहीं, बल्कि चिकित्सकीय जिम्मेदारी और कर्तव्य का हिस्सा बन चुका है।
लाल बहादुर शास्त्री शासकीय अस्पताल, सुपेला में पदस्थ डॉ. अंकिता वर्ष 2019 से पोस्टमार्टम सेंटर में सेवाएं दे रही हैं। अब तक वह करीब एक हजार शवों का पोस्टमार्टम कर चुकी हैं। एक दिन में सर्वाधिक 10 शवों का पोस्टमार्टम करने का अनुभव भी उनके पास है। अस्पताल में वर्तमान में रोजाना औसतन पांच से छह शव पोस्टमार्टम के लिए आते हैं।
शुरुआत में पोस्टमार्टम करना था बेहद मुश्किल
मेडिकल की पढ़ाई के दौरान शरीर की चीर-फाड़ की प्रक्रिया से परिचित होने के कारण डॉ. अंकिता को लगता था कि पोस्टमार्टम का काम बहुत मुश्किल नहीं होगा। लेकिन वर्ष 2019 में जब उन्होंने वास्तविक परिस्थितियों में ड्यूटी शुरू की तो अनुभव अलग रहा।
शुरुआती दिनों में पोस्टमार्टम के बाद खाना खाने तक का मन नहीं करता था। आंखें बंद करते ही शवों के दृश्य सामने आने लगते थे और रात में सपनों में भी वही दृश्य दिखाई देते थे। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को मानसिक रूप से मजबूत किया और इस कठिन जिम्मेदारी को अपने पेशे का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लिया।
परिचित के शव का पोस्टमार्टम सबसे भावुक पल
डॉ. अंकिता के लिए सबसे भावुक क्षण तब आया, जब उनके पिता के एक परिचित और मित्र का निधन हुआ। वह उन्हें व्यक्तिगत रूप से अच्छी तरह जानती थीं और पोस्टमार्टम की जिम्मेदारी भी उन्हीं को निभानी थी।
ऐसे समय में भावनाओं को नियंत्रित करना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला और चिकित्सकीय दायित्व पूरा किया। उनके अनुसार डॉक्टर के लिए व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर कानूनी और चिकित्सकीय प्रक्रिया को पूरा करना जरूरी होता है।
त्योहार भी नहीं रोकता पोस्टमार्टम की ड्यूटी
डॉ. अंकिता बताती हैं कि पोस्टमार्टम की जिम्मेदारी दिन, समय या त्योहार देखकर नहीं आती। आपात स्थिति में डॉक्टर को हर परिस्थिति में तैयार रहना पड़ता है। वह दीपावली के दिन भी पोस्टमार्टम कर चुकी हैं।
अपने मायके और ससुराल की पहली डॉक्टर डॉ. अंकिता ने इस कठिन कार्यक्षेत्र को सेवा और पेशेवर जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया है।
अब पोस्टमार्टम उनके लिए जिम्मेदारी
समय के साथ डॉ. अंकिता ने मानसिक रूप से खुद को इस काम के लिए तैयार किया। अब उनके लिए पोस्टमार्टम भय का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का विषय है।
उनका कहना है कि मेडिकल शिक्षा के दौरान ही डॉक्टरों को ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार किया जाता है। पोस्टमार्टम के दौरान कानूनी प्रक्रिया और चिकित्सकीय प्रोटोकॉल का पालन करना बेहद जरूरी होता है। जिन लोगों का पोस्टमार्टम किया जाता है, उन्हें सामान्यतः डॉक्टर व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, जिससे भावनात्मक दूरी बनाए रखते हुए प्रक्रिया पूरी करने में मदद मिलती है।
बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोस्टमार्टम सबसे कठिन
डॉ. अंकिता के लिए छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोस्टमार्टम सबसे चुनौतीपूर्ण होते हैं। उन्होंने दो माह के बच्चे का भी पोस्टमार्टम किया है। ऐसे मामलों में चिकित्सकीय सावधानी के साथ भावनाओं पर नियंत्रण रखना भी बेहद जरूरी होता है।
ट्रेन और सड़क दुर्घटनाओं में शरीर को गंभीर क्षति होने के कारण पोस्टमार्टम की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है। वहीं हत्या और आत्महत्या जैसे मामलों में हर तथ्य और साक्ष्य को सुरक्षित रखना डॉक्टर की अतिरिक्त जिम्मेदारी होती है।
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