1301 ईस्वी से जुड़ी है परंपरा, बस्तर राजपरिवार ने विधि-विधान से निभाई रस्म; राज्य की सुख-शांति और समृद्धि के लिए की जाती है पूजा

जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे की अनूठी परंपराओं में शामिल निशा जात्रा की रस्म मंगलवार और बुधवार की दरमियानी रात करीब 2 बजे विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। शहर के अनुपमा चौक स्थित गुड़ी मंदिर में आयोजित इस रस्म में बस्तर राजपरिवार के सदस्यों सहित जनप्रतिनिधि, दशहरा पर्व समिति के सदस्य और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। परंपरा के अनुसार, इस दौरान 11 बकरों की बलि दी गई।
आधी रात को राजमहल से गुड़ी मंदिर पहुंचा राजपरिवार
निशा जात्रा की रस्म के लिए बस्तर राजपरिवार के सदस्य राजमहल से गाजे-बाजे के साथ पैदल गुड़ी मंदिर पहुंचे। महाष्टमी और नवमी की दरमियानी रात आयोजित होने वाली इस परंपरा में पूजा-अर्चना और देवी-देवताओं को भोग अर्पित करने की विधि निभाई जाती है।
इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव, बस्तर सांसद महेश कश्यप, दशहरा पर्व समिति के सदस्य, राजगुरु, जमींदार परिवारों के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में बस्तरवासी उपस्थित रहे। बस्तर दशहरे की इस प्राचीन रस्म को देखने के लिए बाहर से आए पर्यटक भी पहुंचे।
1301 ईस्वी से जुड़ी है निशा जात्रा की परंपरा
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के अनुसार, निशा जात्रा की परंपरा की शुरुआत वर्ष 1301 ईस्वी में हुई थी। प्राचीन समय में राजा-महाराजा राज्य को बुरी शक्तियों से सुरक्षित रखने की मान्यता के साथ यह अनुष्ठान करते थे।
परंपरा के अनुसार, देवी और अन्य देवताओं को भोग अर्पित किया जाता है। वर्तमान में यह रस्म राज्य में शांति, सुख और समृद्धि की कामना के साथ निभाई जाती है।
देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है भोग
कमलचंद भंजदेव के मुताबिक, निशा जात्रा के दौरान मावली देवी सहित अन्य देवी-देवताओं को भोग लगाया जाता है। सिंह द्वार और मां दंतेश्वरी मंदिर सहित विभिन्न स्थानों पर भी भोग अर्पित करने की परंपरा है।
इस अनुष्ठान को आधी रात के बाद संपन्न किया जाता है और इसकी कुछ प्रक्रियाएं परंपरागत रूप से गोपनीय रखी जाती हैं। निशा जात्रा बस्तर दशहरे की उन विशिष्ट रस्मों में शामिल है, जो क्षेत्र की ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराओं को दर्शाती हैं।
बस्तर दशहरे की विशिष्ट पहचान है यह रस्म
बस्तर दशहरा अपनी लंबी अवधि और विशिष्ट जनजातीय परंपराओं के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। निशा जात्रा भी इसी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सदियों से चली आ रही इस रस्म में समय के साथ बदलाव आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अब इस दौरान 11 बकरों की बलि दी जाती है।
इस परंपरा के प्रति लोगों की आस्था और सांस्कृतिक महत्व के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग बस्तर दशहरे में शामिल होने जगदलपुर पहुंचते हैं।
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