मौसम अनुकूल नहीं होने से झुलसा, पर्णच्छद झुलसा, तना सड़न, भूरा धब्बा और कंडुआ रोग का बढ़ सकता है प्रकोप

रायगढ़, 3 सितंबर 2026। मौसम अनुकूल नहीं रहने के कारण इन दिनों धान की फसल में विभिन्न प्रकार के रोगों का प्रकोप देखने को मिल सकता है। समय पर रोग की पहचान और उचित प्रबंधन नहीं होने पर धान की उपज प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसे देखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र रायगढ़ ने किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने और रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञों की सलाह लेने की अपील की है।
कृषि विज्ञान केन्द्र रायगढ़ के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.एस. राजपूत तथा विषय वस्तु विशेषज्ञ (पौध रोग) श्रीमती दीपमाला लकड़ा ने किसानों को धान में होने वाले प्रमुख रोगों की पहचान और उनके प्रबंधन की जानकारी दी है।
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से विशेष रूप से कहा है कि फसल में रोग के लक्षण दिखाई देने पर अपने स्तर पर किसी भी दवा का प्रयोग न करें। कृषि विभाग अथवा कृषि विज्ञान केन्द्र के विशेषज्ञों से सलाह लेकर ही अनुशंसित दवा और निर्धारित मात्रा का इस्तेमाल करें। इससे अनावश्यक खर्च कम करने के साथ फसल को होने वाले नुकसान को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
झुलसा यानी ब्लास्ट रोग की ऐसे करें पहचान
धान में झुलसा या ब्लास्ट रोग मुख्य रूप से फफूंद के कारण होता है। इसके शुरुआती लक्षण पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं। धीरे-धीरे ये धब्बे बढ़कर नाव के आकार के हो जाते हैं। इनके बीच का हिस्सा हल्का भूरा और किनारे गहरे कत्थई रंग के दिखाई देते हैं।
बाद में रोग का असर पर्णच्छद, गांठ और बालियों पर भी पड़ सकता है। इससे फसल की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।
रोकथाम के लिए किसानों को स्वस्थ और रोगरोधी किस्मों का चयन करने, समय पर बुवाई करने तथा संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करने की सलाह दी गई है। नाइट्रोजन उर्वरक की पूरी मात्रा एक साथ देने के बजाय जरूरत के अनुसार विभाजित मात्रा में देना बेहतर बताया गया है। रोग के लक्षण मिलने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से अनुशंसित कवकनाशी का प्रयोग किया जा सकता है।
जीवाणु जनित झुलसा में नाइट्रोजन से रहें सावधान
जीवाणु जनित झुलसा में पत्तियों के ऊपरी सिरे से हरे-पीले और जलधारित धब्बे दिखाई दे सकते हैं। ये धब्बे बाद में पत्तियों के किनारों से नीचे की ओर फैलने लगते हैं। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियां समय से पहले सूख सकती हैं।
इस रोग की स्थिति में नाइट्रोजन की अधिक मात्रा रोग को बढ़ा सकती है। इसलिए प्रमाणित और स्वस्थ बीज का उपयोग, उचित पौध दूरी तथा संतुलित उर्वरक प्रबंधन जरूरी है। रोग के लक्षण दिखाई देने पर नाइट्रोजन का प्रयोग रोककर कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार आवश्यक उपचार करने की बात कही गई है।
पर्णच्छद झुलसा से बचाव के लिए रखें खेत में उचित दूरी
पर्णच्छद झुलसा रोग में पौधे के पर्णच्छद और पत्तियों पर हल्के भूरे या तांबे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। समय के साथ इनका रंग धूसर हो सकता है।
खेत में अधिक नमी और पौधों की अधिक सघनता से इस रोग के फैलने की संभावना बढ़ जाती है। इससे बचने के लिए उचित पौध दूरी बनाए रखना, संतुलित उर्वरक का उपयोग करना और संक्रमित पौध अवशेषों का उचित प्रबंधन जरूरी है।
रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार अनुशंसित कवकनाशी का छिड़काव किया जा सकता है।
तना सड़न रोग में बीज उपचार जरूरी
धान में तना सड़न यानी शीथ रॉट एक बीजजनित रोग है। इसका प्रकोप मुख्य रूप से गभोट अवस्था में दिखाई देता है। गभोट के निचले हिस्से में हल्के भूरे रंग के अनियमित धब्बे बनते हैं। अधिक प्रकोप होने पर धान की बालियां गभोट से बाहर नहीं निकल पातीं।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार स्वस्थ बीज का चयन कर नमक के घोल से उसकी जांच करनी चाहिए। बुवाई से पहले मेंकोजेब + कार्बेण्डजीम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचार करने से रोग के प्रसार को कम करने में मदद मिल सकती है।
खेत में संतुलित उर्वरक का प्रयोग करने और रोगी पौधों के अवशेषों को नष्ट करने की सलाह दी गई है। शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञ की सलाह से थाइफ्लूजामाइड 24 एससी 1.5 मिलीलीटर, प्रोपिकोनाजोल 1 मिलीलीटर या हेक्साकोनाजोल 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक कवकनाशी का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
भूरा धब्बा रोग से बचाव के लिए करें बीज उपचार
भूरा धब्बा यानी ब्राउन स्पॉट भी धान का एक बीजजनित रोग है। इसमें पत्तियों पर गोल या अंडाकार भूरे रंग के धब्बे बनते हैं, जो कई बार पीले घेरे से घिरे दिखाई देते हैं।
इससे बचाव के लिए स्वस्थ बीज का चयन, नमक के घोल से बीज की जांच और बुवाई से पहले मेंकोजेब + कार्बेण्डजीम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचार करने की सलाह दी गई है।
किसानों को नाइट्रोजन का संतुलित उपयोग करने और खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखने की सलाह दी गई है। रोगरोधी किस्मों में इंदिरा राजेश्वरी, बम्लेश्वरी और इंदिरा सुगंधित धान-1 का चयन किया जा सकता है।
अधिक प्रकोप होने पर विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार प्रोपिकोनाजोल 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी या एजोक्सीस्ट्रोबिन 11% + टेबुकोनाजोल 18.3% एससी 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव किया जा सकता है।
कंडुआ रोग पर रखें विशेष नजर
खरीफ धान में फॉल्स स्मट यानी कंडुआ रोग भी चिंता का कारण बन सकता है। इस रोग में धान के कुछ दाने पीले या हरे-काले रंग के पाउडर जैसे बीजाणु समूह में बदल जाते हैं।
अधिक नमी और बारिश वाले मौसम में इस रोग का प्रकोप बढ़ने की संभावना रहती है। कृषि विज्ञान केन्द्र ने किसानों को सलाह दी है कि बाली निकलने से पहले की अवस्था से ही खेत की नियमित निगरानी करें।
रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर स्वयं दवा का प्रयोग करने के बजाय कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेकर अनुशंसित कवकनाशी का इस्तेमाल करें।
किसानों के लिए विशेषज्ञों की खास सलाह
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से कहा है कि धान की फसल में किसी भी तरह के असामान्य लक्षण दिखाई देने पर तुरंत खेत का निरीक्षण करें। रोग की सही पहचान के बाद ही उपचार किया जाए। बिना विशेषज्ञ सलाह के दवाओं का मिश्रण या अनावश्यक छिड़काव करने से बचें।
समय पर रोग की पहचान, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, स्वस्थ बीज और उचित कृषि तकनीक अपनाकर फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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